जिनके दरवाज़े कभी खुले थे अदब से मेरे आगे,
उन महलो की खिड़कियाँ मै दूर से देखा करता हूँ.
जिन गलियों में हुआ करती थी कभी उम्मीद मुलाकात की
अब भी उन गलियों से मै , अक्सर गुज़रा करता हूँ
नहीं उम्मीद कोई न ही कोई अरमान ही रहे बाकी
न मौत आई न जिंदगी में तुझसा सनम आया
भूला सकू वो राहे, वो यादे यूँ ही
दीवाने में ना अबतक इतना दम आया
मज़ार - ए -इश्क पर मै रोज़ चढ़ता हूँ उतरता हूँ
ना चाह कर भी तेरी गली से मै रोज़ गुजरता हूँ
ANSH
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