Monday, November 7, 2011

मुकम्मल निशाँ हमारे देखे

हारे कदमो के हमसफ़र ,बैसाखियों के सहारे देखे
फलक में तनहा बदल ने , कुछ उड़ते हुए गुबारे देखे
देखे नहीं थे मंज़र जो मैंने बादशाहत में
वो भीगी हुई पलको के किनारे देखे

डूबा सूरज यों ,स्याह हुई सारी धरती
अमावस तनहाइयों की सर्द सी आहे भरती
खुद को झोंककर इन बेदर्द अंधेरो में
बरसो बाद फिर मैंने, सितारे देखे

गुबार ए ख़ाक में अब नज़र कुछ साफ़ नहीं
यहाँ बस तू ही तू है और कहीं भी आप नहीं
ज़मानो से कहीं भी मेरा नाम ओ नीशान नहीं
खाक में हमने, मुकम्मल निशाँ हमारे देखे

ANSH

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