मेरा जीवन है किरणों सा ,हर क्षण रोशन कर जाता हूँ
हर भोर को जिंदा होता हूँ ,और साँझ ढले मर जाता हूँ
मै उस जल की प्रतिमा हूँ, जिसका रंग नहीं आकार नहीं
स्वछन्द पवन का हूँ सहचर, मुझ पर निज का अधिकार नहीं
भाषाहीन आवाहन करके मै नित्य तुझे जगाता हूँ
हर भोर को जिंदा होता हूँ ,और साँझ ढले मर जाता हूँ१
चलता हूँ चलता रहता हूँ ,चलना ही मेरी किस्मत है
मुझको तुझसे कोई प्रेम नहीं, यूँही जलना मेरी आदत है
प्रेम ह्रदय में कुछ दिन रहकर प्रेमकथा हो जाता है
प्रेमी बातों में कुछ दिन रहकर यादों में खो जाता है
आगे में भी बढ़ता हूँ ,पर रोज़ वहीँ मिल जाता हूँ
हर भोर को जिंदा होता हूँ ,और साँझ ढले मर जाता हूँ२
Ansh
very nice dear...
ReplyDeleteGre8 Going
ReplyDelete