Wednesday, November 16, 2011

हर चीज़ यहाँ ज़रा सी कम है ...

कडवी कडवी सच्चाई या मीठी मीठी सी बातें
बादल और आँखों से होने वाली सारी बरसाते
कुछ तो हरे भरे दिन कम है , कुछ कम है प्यारी रातें
कुछ मुर्दे साँसों को तरसे , कुछ जिंदा ही मर जाते
कुछ की सुख में , कुछ की दुःख में , आँख यहाँ सभी की नम है
हर चीज़ यहाँ ज़रा सी कम है ............

महल हो ,घर हो, या सड़को पर बिखरी हुई दुकाने हो
हो मस्जिद मंदिर ,गुरुद्वारे ,या बहके मैखाने हो
श्रद्धा हो , ईमान हो या फिर पुश्तो के अफ़साने हो
दौर हो नया नवेला चाहे ,गुज़रे हुए ज़माने हो
सब आग लगाते एक दूजे को , जब जब बदले ये मौसम है
हर चीज़ यहाँ ज़रा सी कम है ............

उस नन्ही सी अंगडाई में, रोज़ कहानी परियों की
चाराने की वो मिश्री , एक किलकारी फुलझड़ियों की
दिन चमकीला रस्ते का , वो अँधेरी रातें गलियों की
कुछ मुरझाये फूलों का गम,कुछ बैचेनी इन कलियों की
गम न हो तो कोई ख़ुशी नहीं , पर ख़ुशी नहीं होने का गम है
हर चीज़ यहाँ ज़रा सी कम है ............

ANSH

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