Thursday, July 28, 2011

जनाज़ा मुबारक

मुबारक बहुत था मौका ,जिस दिन मरा दीवाना
वो मेरे दिल के कांटे ,गुलशन बनाने आये
मेरे जनाज़े का मै ,मंज़र ही क्या बताऊ
सब लोग मुस्कुराकर ,आंसू बहाने आये

सब लोग दिलजले थे ,सबको बहुत थे शिकवे
सब मेरी बगावतों के , किस्से सुनाने आये

वो राह शुक्र करती , जिस राह से गुज़रता
सारे जहाँ के भूले , मुझे रास्ता दिखाने आये

एक बोझ ही समझ कर, कुछ ने मुझे उठाया
कुछ सैर की गरज से ,रिश्ते निभाने आये

वो राह में खड़ी थी , दीदार की गरज से
जब लोग उसका दामन ,मुझसे बचाने आये

वो अश्को से डूबी आँखें , कह न सकी जो मुझसे
वो अंश का मुकद्दर ,ज़ालिम सुनाने आये

ज़ालिम ज़माने ने , मुझे छोड़ा नहीं था तनहा
दर था कहीं न कोई मुझको जगाने आये

ANSH

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